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सिद्धार्थनगर का स्वास्थ्य तंत्र: ‘इलाज’ के नाम पर मौत का कारोबार, कब जागेगा प्रशासन?

नवजात की मौत ने खोली पोल: क्या सिद्धार्थनगर के अस्पताल 'अवैध' कसाईखाने बन चुके हैं?

अजीत मिश्रा (खोजी)

सिद्धार्थनगर: स्वास्थ्य तंत्र की कब्रगाह बना ‘अवैध अस्पतालों’ का जाल, नवजात की मौत ने खोली सिस्टम की पोल

ब्यूरो रिपोर्ट, बस्ती मंडल

  • मुनाफे की अंधी दौड़: सिद्धार्थनगर में अवैध अस्पतालों का ‘नंगा नाच’, सिस्टम मौन!
  • सिद्धार्थनगर की स्वास्थ्य व्यवस्था ICU में: मासूम की मौत पर प्रशासन की चुप्पी कब टूटेगी?
  • क्या सिद्धार्थनगर के अस्पतालों में मरीजों का इलाज होता है या ‘डेथ वारंट’ साइन किया जाता है?

​सिद्धार्थनगर जनपद में स्वास्थ्य व्यवस्था ‘इलाज’ नहीं, बल्कि ‘इंतकाम’ ले रही है। आए दिन सामने आ रही दर्दनाक घटनाएं अब महज हादसे नहीं, बल्कि यह पूरे स्वास्थ्य तंत्र की जड़ों में फैले उस कैंसर का प्रमाण हैं, जिसका नाम है—‘बेलगाम निजी अस्पतालों का काला कारोबार’। हाल ही में एक नवजात की मौत ने इस पूरे तंत्र के उस नंगे सच को उजागर कर दिया है, जिसे स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन अपनी फाइलों की धूल के नीचे दबाने की कोशिश करता है।

मौत के सौदागरों का खुला तांडव

​हैरानी इस बात की है कि सिद्धार्थनगर में अवैध और फर्जी अस्पतालों की भरमार है। ये अस्पताल मरीजों के जीवन को दांव पर लगाकर सिर्फ अपनी तिजोरियां भरने में मशगूल हैं। बिना अल्ट्रासाउंड, बिना हार्टबीट की जांच और बिना किसी वैध योग्यता के मरीजों का ऑपरेशन करना—क्या यह इलाज है या सोची-समझी हत्या? जब मरीज की हालत बिगड़ती है, तो ये तथाकथित डॉक्टर उसे दूसरे जिलों के लिए ‘रेफर’ कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं। यह न केवल चिकित्सा नियमों की धज्जियां उड़ाना है, बल्कि मानवता के नाम पर जघन्य अपराध है।

प्रशासन की चुप्पी: मिलीभगत या मजबूरी?

​सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ये मौत के केंद्र किसके संरक्षण में फल-फूल रहे हैं? हर बड़ी घटना के बाद वही घिसी-पिटी पटकथा दोहराई जाती है—‘जांच के आदेश दिए गए हैं, दोषियों पर कार्रवाई होगी’। लेकिन, क्या ये जांच केवल फाइलों को रद्दी की टोकरी में भेजने का एक जरिया मात्र है?

​क्या विभाग के जिम्मेदार अधिकारी यह नहीं जानते कि कौन सा अस्पताल फर्जी डिग्री पर चल रहा है? या फिर किसी ऊपरी दबाव और ‘ऊपरी कमाई’ के खेल में सिस्टम इतना लाचार हो चुका है कि उसे किसी की मौत भी सुनाई नहीं देती? जब स्थानीय स्तर पर सबको पता है कि कौन सा संस्थान मौत का अड्डा बना हुआ है, तो फिर प्रशासन की ‘रहस्यमयी चुप्पी’ सीधे तौर पर इनकी मिलीभगत की ओर इशारा करती है।1779805243184064 1 1779805251087385 0

कागजी खानापूर्ति से नहीं, कठोर कार्रवाई से सुधरेगा तंत्र

​अब समय ढकोसलों का नहीं, बल्कि ‘अपरेशन’ का है। केवल नोटिस थमाने या कुछ दिनों के लिए सील करने से ये मौत के सौदागर नहीं रुकेंगे।

  • सख्त लाइसेंसिंग: बिना मानक वाले अस्पतालों को तत्काल स्थायी रूप से बंद किया जाए।
  • जवाबदेही: यदि किसी अस्पताल में लापरवाही से मौत होती है, तो संबंधित डॉक्टर के साथ-साथ वहां के निरीक्षण करने वाले विभागीय अधिकारियों पर भी FIR दर्ज हो।
  • जांच: हर एक अस्पताल की डिग्री और संसाधनों की भौतिक जांच हो, न कि कागजी।

जनता का आक्रोश अब सड़कों पर

​सिद्धार्थनगर की जनता अब और बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है। आज एक नवजात की जान गई है, कल किसी और का अपना कोई होगा। यदि प्रशासन ने इस बार भी खानापूर्ति की, तो समझ लिया जाएगा कि यह सिस्टम पूरी तरह से बिक चुका है।

​अंधे मुनाफे के लिए इंसानियत की बलि देने वाले इन अस्पतालों का ‘नंगा नाच’ अब बंद होना चाहिए। यह मामला अब किसी एक मौत का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की साख का है। या तो सिस्टम सुधरे, या फिर आम जनता को यह समझने पर मजबूर होना पड़ेगा कि उनके लिए स्वास्थ्य व्यवस्था अब कोई विकल्प नहीं, बल्कि एक ‘डेथ वारंट’ है।

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